क्या अब 100% टैरिफ की संभावना खत्म हो गई है? ट्रंप–शी शिखर बैठक से पहले अमेरिका और चीन ने ‘महत्वपूर्ण ढांचा समझौते’ पर की सहमति, दुर्लभ खनिजों को लेकर तनाव घटाने की कोशिश
कई महीनों तक चले तनाव, तीखी बयानबाज़ी और आर्थिक टकराव के बाद, अब वॉशिंगटन और बीजिंग टकराव की राह से हटते दिख रहे हैं। दोनों देश अब एक नाजुक लेकिन संभावित रूप से स्थायी सुलह (détente) की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं।
रविवार को अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने घोषणा की कि संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन ने एक “बहुत महत्वपूर्ण ढांचा समझौता” (substantial framework) तैयार किया है। इसका उद्देश्य चीनी आयात पर प्रस्तावित 100% टैरिफ को रोकना और चीन द्वारा दुर्लभ खनिज (rare earths) के निर्यात पर लगाए जाने वाले नियंत्रणों को फिलहाल टालना है।
कुआलालंपुर में दो दिन की गहन वार्ता के बाद रॉयटर्स से बात करते हुए बेसेंट ने कहा कि यह नई समझ दोनो देशों के बीच अधिक संतुलित और सहयोगात्मक व्यापार संबंधों की दिशा में एक कदम है। साथ ही, यह आगामी सप्ताह में होने वाली राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की ऐतिहासिक मुलाकात के लिए स्वर तैयार करती है।
बेसेंट ने NBC के “मीट द प्रेस” कार्यक्रम में कहा,
“मुझे नहीं लगता कि 100% टैरिफ लागू किए जाएंगे। हम चीन के प्रस्तावित दुर्लभ खनिज निर्यात नियंत्रणों को निलंबित करने पर भी काम कर रहे हैं — जो दोनों अर्थव्यवस्थाओं के लिए बड़ी राहत होगी।”
समझौते के मुख्य बिंदु और लक्ष्य
हालांकि समझौते के पूर्ण विवरण अभी सार्वजनिक नहीं किए गए हैं, लेकिन वार्ता से जुड़े सूत्रों के अनुसार, इसमें कई अहम प्रावधान शामिल हैं जिनका उद्देश्य व्यापारिक शत्रुता के नए दौर को रोकना है। इनमें मुख्य रूप से शामिल हैं —
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ट्रंप द्वारा प्रस्तावित 100% टैरिफ का निलंबन, जो 1 नवंबर से लागू होने वाला था।
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चीन द्वारा दुर्लभ खनिजों के निर्यात नियंत्रण से अस्थायी राहत, जिससे तकनीकी और रक्षा उद्योगों में आपूर्ति श्रृंखला की चिंता घटेगी।
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कृषि उत्पादों पर नई बातचीत की शुरुआत, विशेष रूप से अमेरिकी सोयाबीन और अन्य कृषि उत्पादों के लिए चीन के बाज़ार को फिर से खोलने पर जोर।
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फेंटानिल तस्करी पर सहयोग बढ़ाना, जो अमेरिका के लिए ओपिऑयड संकट से निपटने में प्रमुख चिंता का विषय रहा है।
इन चर्चाओं में दोनों देशों के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे, जिनमें चीन के उपप्रधानमंत्री हे लीफेंग, व्यापार वार्ताकार ली चेंगगांग, और अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीर शामिल थे।
ली ने पुष्टि की कि दोनों पक्षों ने केवल मौजूदा व्यापार युद्धविराम को बनाए रखने पर ही नहीं, बल्कि निर्यात नियंत्रण संवाद और मादक पदार्थ-रोधी प्रयासों में भी सहयोग करने पर “प्रारंभिक सहमति” बनाई है।
कुआलालंपुर में कूटनीति: शिखर बैठक से पहले शांति का संकेत
यह बातचीत आसियान शिखर सम्मेलन (ASEAN Summit) के दौरान हुई, जिससे दोनों पक्षों को सार्वजनिक विवाद से दूर रहकर शांत कूटनीति (quiet diplomacy) का मौका मिला। यह मई 2025 के बाद से दोनों देशों के बीच सबसे ठोस वार्ता मानी जा रही है — जब अस्थायी व्यापार विराम ने सैकड़ों वस्तुओं पर टैरिफ को रोक दिया था। वह समझौता 10 नवंबर को समाप्त होने वाला था, जिससे एक बार फिर नए व्यापार युद्ध की आशंका पैदा हो गई थी।
बेसेंट ने कहा कि यह नया ढांचा उस परिदृश्य को पूरी तरह बदल सकता है और दोनों देशों को अगले सप्ताह दक्षिण कोरिया में होने वाली ट्रंप–शी बैठक से पहले स्थिरता प्रदान कर सकता है।
उन्होंने कहा,
“अब हमारे पास दोनों राष्ट्रपतियों के लिए आगे बढ़ने की एक मजबूत नींव है। अंतिम निर्णय निश्चित रूप से नेताओं के विवेक पर निर्भर करेगा, लेकिन दिशा सकारात्मक है।”
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, जो रविवार को आसियान बैठक से पहले मलेशिया पहुंचे थे, रिपोर्टरों से बात करते हुए आशावादी दिखाई दिए।
“मुझे लगता है कि हम चीन के साथ एक समझौते तक पहुँचने वाले हैं,” ट्रंप ने कहा। “राष्ट्रपति शी और मैं जल्द ही बातचीत करेंगे, और मेरा मानना है कि हम ऐसा रास्ता निकाल सकते हैं जो दोनों देशों के लिए लाभदायक होगा।”
‘रेयर अर्थ’ फैक्टर: क्यों है यह इतना महत्वपूर्ण
इस विकसित हो रहे ढांचे का सबसे अहम और नाज़ुक हिस्सा है दुर्लभ खनिजों (Rare Earth Minerals) से जुड़ा मुद्दा। ये तत्व सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रिक वाहन बैटरियाँ, पवन टर्बाइन और सैन्य तकनीक जैसे उत्पादों के निर्माण में अनिवार्य हैं — और यही इन्हें अमेरिका–चीन आर्थिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र बना देता है।
चीन के हालिया निर्यात नियंत्रण संबंधी ऐलान ने वैश्विक बाज़ारों में हलचल मचा दी थी। चूँकि चीन दुनिया की 70% से अधिक दुर्लभ खनिज आपूर्ति पर नियंत्रण रखता है, किसी भी तरह की पाबंदी से स्मार्टफोन, सोलर पैनल, रक्षा प्रणालियाँ और ईवी जैसी उद्योगों की आपूर्ति श्रृंखला बुरी तरह प्रभावित हो सकती थी।
अमेरिका इस संभावित खतरे से निपटने के लिए अपने उच्च-तकनीकी निर्यातों (जैसे लैपटॉप और जेट इंजन) पर नियंत्रण की योजना बना रहा था। विश्लेषकों को आशंका थी कि इस तरह की प्रतिशोधात्मक कार्रवाइयाँ (tit-for-tat) दोनों देशों को पूर्ण तकनीकी और आर्थिक टकराव की ओर धकेल सकती हैं।
अगर अब चीन अपने निर्यात प्रतिबंधों को स्थगित करता है, तो यह एक शांतिपूर्ण संकेत माना जाएगा — जो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में स्थिरता लाने और विनिर्माण कंपनियों को राहत देने में मदद करेगा। विशेष रूप से प्रौद्योगिकी और हरित ऊर्जा क्षेत्रों के लिए यह राहत पिछले कई महीनों की अनिश्चितता को काफी हद तक कम कर सकती है।
प्रतिद्वंद्विता और व्यवहारिकता के बीच संतुलन
पिछले दो वर्षों में अमेरिका और चीन एक-दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा और परस्पर निर्भरता के जटिल रिश्ते में उलझे रहे हैं। तकनीकी पहुंच, बाज़ार अवरोधों और हिंद–प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक प्रभाव को लेकर दोनों के बीच लगातार मतभेद रहे हैं। फिर भी, दोनों में से कोई भी देश लंबे समय तक चलने वाले आर्थिक टकराव को झेलने की स्थिति में नहीं है।
बेसेंट की घोषणा से यह संकेत मिलता है कि अब शायद राजनीतिक दिखावे की जगह व्यवहारिकता (pragmatism) ले रही है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यह “महत्वपूर्ण ढांचा” किसी अंतिम समाधान से अधिक एक रीसेट बटन की तरह काम करेगा — जो दोनों देशों को टकराव की कगार से थोड़ा पीछे खींच लेगा।
सिंगापुर के एक एशिया–प्रशांत व्यापार विश्लेषक के शब्दों में,
“यह समझौता किसी की जीत नहीं, बल्कि अस्तित्व की आवश्यकता है। दोनों अर्थव्यवस्थाएँ मुद्रास्फीति के दबाव में हैं, और 2026 से पहले एक और बड़ा व्यापारिक झटका दोनों के लिए असहनीय होगा।”
कृषि निर्यात भी दोनों देशों के लिए राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दा रहा है। अमेरिका अपने कृषि क्षेत्र को सहारा देने के लिए चीन को सोयाबीन निर्यात बढ़ाना चाहता है, वहीं चीन की भागीदारी यह दर्शा सकती है कि वह मंदी और खाद्य मुद्रास्फीति के बीच घरेलू स्थिरता बहाल करना चाहता है।
आगे की राह: सबकी नज़र ट्रंप–शी बैठक पर
अगले सप्ताह होने वाली ट्रंप–शी शिखर बैठक की तैयारियाँ शुरू हो चुकी हैं, और कुआलालंपुर में हुआ यह ढांचा समझौता उस मुलाकात के लिए एक कूटनीतिक आधारशिला साबित हो सकता है। हालाँकि दोनों पक्षों ने स्पष्ट किया है कि अभी कोई अंतिम समझौता नहीं हुआ है, परंतु यह ढांचा इतना ठोस है कि नई टैरिफ घोषणाओं को रोकने और निवेशकों के मनोभाव को स्थिर करने में सहायक हो सकता है।
बाज़ारों ने भी इस खबर पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है — एशियाई शेयर बाज़ारों में हल्की बढ़त दर्ज की गई है और कमोडिटी की कीमतों में स्थिरता लौट आई है। अब निवेशकों की निगाहें इस बात पर हैं कि क्या यह सकारात्मक गति अगले सप्ताह की वार्ता तक कायम रह पाती है।
यदि दोनों नेता इस ढांचे को एक स्थायी समझौते में बदलने में सफल रहते हैं, तो यह पिछले पाँच वर्षों में अमेरिका–चीन आर्थिक तनावों में सबसे बड़ी नरमी साबित हो सकती है — जो न केवल एशिया बल्कि वैश्विक व्यापार समीकरणों को भी पुनर्परिभाषित कर सकती है।
हालाँकि, अगर वार्ता विफल होती है, तो विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यह राहत अस्थायी साबित हो सकती है।
फिलहाल, माहौल सतर्क आशावाद (cautious optimism) का है — एक तूफानी रिश्ते में दुर्लभ सुकून का क्षण।
