तंजानिया में आम चुनाव: स्थिरता का मुखौटा या लोकतंत्र की गिरावट का संकेत?
29 अक्टूबर 2025 को तंजानिया में हुए राष्ट्रपति चुनाव पहली नज़र में तो निरंतरता और स्थिरता का प्रतीक लगे, लेकिन गहराई से देखने पर उन्होंने लोकतांत्रिक गिरावट, विधि के शासन और पूर्वी अफ्रीका में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के भविष्य को लेकर गंभीर चिंताएँ उत्पन्न की हैं।
राष्ट्रपति सामिया सुलुहू हसन, जिन्हें 2021 में अपने पूर्ववर्ती के निधन के बाद सत्ता मिली थी, इस बार अपने पहले पूर्ण कार्यकाल के लिए चुनाव में उतरीं।

चुनाव का सारांश
शासक दल चामा चा मापिंदुज़ी (CCM) ने स्वतंत्रता के बाद से ही तंजानिया पर शासन किया है और हर बार चुनाव जीतता रहा है। हालांकि, इस बार का चुनाव हालिया इतिहास में सबसे कम प्रतिस्पर्धी बताया जा रहा है। मुख्य विपक्षी ताकतें लगभग पूरी तरह से मैदान से बाहर कर दी गईं:
प्रमुख विपक्षी दल चामा चा डेमोक्रासिया ना माईनडेलियो (CHADEMA) को चुनाव से प्रतिबंधित/अयोग्य कर दिया गया, और इसके नेता तुंदु लिस्सु को राजद्रोह के आरोपों में जेल में रखा गया।
दूसरा बड़ा विपक्षी दल ACT–वज़ालेंडो भी अपने राष्ट्रपति उम्मीदवार के अयोग्य घोषित होने से चुनाव नहीं लड़ सका।
इस तरह गंभीर विपक्ष के अभाव में चुनाव हुआ। सरकारी आँकड़ों के अनुसार, लगभग 3.7 करोड़ से अधिक पंजीकृत मतदाताओं में मतदान दर “उच्च” बताई गई, जबकि दार एस सलाम जैसे बड़े शहरों में मतदान केंद्र खाली दिखे — यह बात स्वतंत्र पत्रकारों ने उजागर की।
दमन की पृष्ठभूमि
चुनाव से पहले के महीनों में कई मानवाधिकार संगठनों ने चेतावनी जारी की थी।
रिपोर्टों में गायब हो जाने, विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी, मीडिया और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर नियंत्रण, और भय के माहौल की पुष्टि की गई।
एक प्रमुख मामला था — हम्फ्री पोलपोल, जो पूर्व में CCM के नेता थे और सरकार की आलोचना करने के बाद “गायब” हो गए।
मतदान से पहले और मतदान के दिन, दार एस सलाम सहित कई शहरी इलाकों में विरोध प्रदर्शन हुए।
प्रदर्शनकारियों ने “फर्जी चुनाव” के खिलाफ नारे लगाए और असली विपक्ष की अनुपस्थिति पर नाराज़गी जताई।
सुरक्षा बलों ने आँसू गैस, टैंक, इंटरनेट ब्लैकआउट और कर्फ्यू के ज़रिए विरोध को दबा दिया।
चुनाव परिणाम और उसके बाद की स्थिति
आधिकारिक नतीजों में राष्ट्रपति सामिया सुलुहू हसन को 97% से अधिक वोटों के साथ विजेता घोषित किया गया।
हालाँकि, कई पर्यवेक्षकों ने इस आंकड़े को अविश्वसनीय बताया — खासकर तब, जब सरकार की लोकप्रियता को लेकर जनता में कुछ संशय देखा गया और विपक्षी उम्मीदवार ही मौजूद नहीं थे।
अंतरराष्ट्रीय संस्थानों ने चिंता व्यक्त की कि मतदाता अपनी स्वतंत्र इच्छा से मतदान नहीं कर पाए।
चुनाव के बाद सरकार ने शपथ ग्रहण समारोह आयोजित किया और एकता और स्थिरता का संदेश दिया,
लेकिन आलोचकों ने कहा कि पूरी प्रक्रिया की वैधता संदिग्ध बनी हुई है।
भू-राजनीतिक और घरेलू निहितार्थ
एक-दलीय प्रभुत्व का सुदृढ़ीकरण
दशकों से CCM का वर्चस्व रहा है, लेकिन कभी उम्मीद थी कि विपक्षी दल उसकी पकड़ को चुनौती दे पाएँगे।
यह चुनाव उस दिशा में एक कदम है जहाँ प्रतिस्पर्धा लगभग समाप्त हो गई है।
अब सवाल यह नहीं है कि CCM जीतेगा या नहीं, बल्कि यह है कि बिना विपक्ष के शासन कैसे बदलेगा।
पूर्वी अफ्रीका में लोकतंत्र का क्षरण
तंजानिया अब उस क्षेत्रीय प्रवृत्ति का हिस्सा बनता जा रहा है जहाँ शासक दल सरकारी संस्थाओं, न्याय प्रणाली और सुरक्षा बलों का उपयोग कर चुनावी विकल्पों को सीमित करते हैं।
भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से यह प्रवृत्ति लोकतांत्रिक संस्थानों को कमजोर, निवेशकों के भरोसे को कम और शासन की पारदर्शिता को घटा सकती है।
स्थिरता बनाम जन-आवाज़
एक तरफ, राजनीतिक स्थिरता और बिना अव्यवस्था के सरकार का बने रहना विदेशी निवेशकों और विकास भागीदारों के लिए आकर्षक हो सकता है।
तंजानिया की अर्थव्यवस्था ने हाल के वर्षों में लगभग 5% की स्थिर जीडीपी वृद्धि दिखाई है, विशेषकर कृषि, पर्यटन और खनन के क्षेत्र में। लेकिन दूसरी तरफ, जब जनसंख्या का बड़ा हिस्सा स्वयं को वंचित महसूस करता है, तो असंतोष और अप्रत्याशित अस्थिरता का खतरा बढ़ जाता है।
युवा वर्ग का मोहभंग और राजनीतिक उदासीनता
शहरी क्षेत्रों में कम मतदान के संकेत बताते हैं कि युवाओं में यह भावना बढ़ रही है कि उनका वोट मायने नहीं रखता। तंजानिया जैसी युवा आबादी वाले देश में यह दीर्घकालिक लोकतांत्रिक उदासीनता को जन्म दे सकता है। राजनीतिक वैधता केवल जीतने से नहीं आती, बल्कि नागरिकों को सार्थक विकल्प देने से आती है।
अंतरराष्ट्रीय संबंध और सहायता पर असर
पश्चिमी सरकारें और बहुपक्षीय संस्थाएँ आमतौर पर राजनीतिक स्वतंत्रता और निष्पक्ष चुनावों को सहायता और व्यापार के मानक से जोड़ती हैं। तंजानिया के इस चुनाव पर प्रतिक्रिया नरम लेकिन सतर्क हो सकती है — जिसमें शर्तों के साथ सहायता, सख्त निगरानी या सुधार की मांगें शामिल हो सकती हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी छवि पर भी असर पड़ सकता है।
घरेलू नीतिगत दिशा
बिना प्रतिस्पर्धा के, राष्ट्रपति हसन और CCM अब अपनी नीतियों को अधिक आक्रामक रूप से लागू कर सकते हैं — जिसमें कुछ सकारात्मक (बुनियादी ढाँचा, कृषि, औद्योगीकरण) और कुछ नकारात्मक (केन्द्रित शक्ति, कमजोर जवाबदेही) पहलू हो सकते हैं। हसन ने “काम और गरिमा” (Kazi na Uhodashi) के नारे पर चुनाव लड़ा, जो कृषि और राष्ट्रीय एकता पर ज़ोर देता है। अब देखना यह होगा कि वह विकास और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे साधती हैं।
अंतिम विचार
2025 का तंजानिया चुनाव एक निर्णायक मोड़ है। ऊपरी तौर पर यह स्थिरता और निरंतरता दिखाता है — सत्ता में वही दल, वही राष्ट्रपति, वही व्यवस्था। लेकिन इसके नीचे एक गहरी सच्चाई छिपी है — लोकतांत्रिक विकल्प सीमित हो गए हैं, विपक्ष हाशिए पर है, और जनता की भागीदारी औपचारिकता बन गई है।
भू-राजनीतिक दृष्टि से, तंजानिया अब उस मॉडल से दूर जा रहा है
जहाँ बहुदलीय प्रतिस्पर्धा लोकतंत्र की पहचान थी,
और बढ़ रहा है उस दिशा में जहाँ चुनाव मात्र औपचारिक प्रक्रिया बनते जा रहे हैं।
इसके प्रभाव अनेक हैं —
शासन, वैधता, निवेशकों के विश्वास और पूर्वी अफ्रीका में तंजानिया की भूमिका — सभी पर इसका गहरा असर पड़ेगा।